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बॉम्बे टॉकीज़ और राजनारायण दुबे की कहानी - अध्याय ४


सपनों की नगरी की स्थापना


भारत में हॉलीवुड की तर्ज पर स्टूडियो में फिल्म निर्माण का तरीका सन् १९३१ में शुरू हो चुका था। हिमान्शु राय ने जर्मनी के यू. एफ. ए. स्टूडियो के सहयोग से तीन मूक फिल्मों का निर्माण भी किया था। वह फिल्में हैं - 'लाइट ऑफ एशिया' (१९२५), ऐतिहासिक स्मारक 'ताजमहल' के महान शिल्पकार शिराज के जीवन पर फिल्म 'शिराज' (१९२८) और 'थ्रो ऑफ डायस' (१९२८)। इन सभी फिल्मों के नाम भारत में बनी पन्द्रह मूक फिल्मों की सूची में शामिल हैं। "शिराज' की तर्ज पर ही फिल्मकार वी. शान्ताराम ने जीतेन्द्र और राजश्री को लेकर फिल्म 'गीत गाया पत्थरों ने' का भी निर्माण सन् १९६४ में किया था। यह जीतेन्द्र की पहली फिल्म के रूप में याद की जाती है।

हिमान्शु राय को अपने अभिनय के साथ फिल्म तकनीक के ज्ञान के प्रति भी गहरा लगाव था। जब लंदन में फिल्म निर्माण के दौरान वो लगातार असफल हुए तब उनकी इसी इच्छा ने भारत की व्यावसायिक नगरी बम्बई में एक आधुनिक सिनेमा कम्पनी की परिकल्पना को उनके दिलों-दिमाग में जन्म दिया। गौरतलब है कि 'बॉम्बे टॉकीज़ घराना' का स्टूडियो 'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' बोलती फिल्मों के प्रारम्भिक दौर में भारत का सबसे बड़ा अत्याधुनिक सुविधाओं वाला और उससे जुडे कर्मचारियों एवं उनके परिवारों को सुख-सुविधायें देने वाला घराना बना।


'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' के निर्माण से पहले कम्पनी द्वारा भारत की पहली मराठी बोलती फिल्म 'अयोध्या का राजा’ (१९३२) का नाम लिया जाता है। इस फिल्म का निर्माण मराठी के साथ-साथ हिन्दी भाषा में भी हुआ था। प्रभात कम्पनी द्वारा देश की सांस्कृतिक से जुडी और अपनी माटी की महक वाली फिल्मों का निर्माण होता उन फिल्मों में साहित्य और नाटकों से जुड़े विषय ही अधिक हुआ करते थे। यही कारण था कि प्रभात कम्पनी हमेशा आर्थिक दृष्टि से कमजोर ही रही। भारत में फिल्मों के निर्माण में आर्थिक कमजोरी का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यह भी रहा कि फिल्मों की छोटी-बड़ी तकनीकी सहायता के लिए फिल्मकारों को विदेश जाना पड़ता था, इस तरह फिल्मों के निर्माण का खर्च अधिक हुआ करता था और आमदनी नहीं के बराबर रहती थी।


भारत में दूसरी फिल्म निर्माण कम्पनी बनी 'न्यू थियेटर्स' । इसके निर्माता वीरेन्द्रनाथ सरकार विलायत में हिमान्शु राय के सहपाठी रह चुके थे। हिमान्शु राय वहीं रहकर फिल्म निर्माण कम्पनी से जुड़ गये थे, जबकि वीरेन्द्रनाथ सरकार अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत लौट आये थे। सिनेमा के प्रति उनका भी लगाव हिमान्शु राय के कारण ही हुआ था। उन्होंने अपने पैसों से 'न्यू थिएटर्स' फिल्म निर्माण कम्पनी और एक प्रकार का प्रयोगशाला बनाकर गुरू रवीन्द्रनाथ टैगोर और शरतचन्द्र की कृतिया पर फिल्मों का निर्माण किया। अपनी कम्पनी की स्थापना के कुछ ही दिन बाद 'न्यू थियेटर्स' ने निर्देशक देवकी बोस के साथ फिल्म 'चण्डीदास (१९३२) बनायी। यह पहली फिल्म थी, जिसमें सम्वादों के स्थान पर पारसगीत का प्रयोग किया गया था। 'चण्डीदास' के बाद देवकी बात निदेशन में 'राजरानी मीरा' (१९३३) जीवन नाटक (१९३५) जैसी फिल्म बनीं, मगर इन फिल्मों को कोई खास सफलता नहीं मिल सका।

हिमान्शु राय विदेश में रहते हुए फिल्म निर्माण की उच्चकोटि की तकनीक देख चुके थे और वह अपनी पिछली दो फिल्म निर्माण कम्पनियों की दुर्दशा देख चुके थे, जिसकी वजह से वह आर्थिक रूप भी कमज़ोर हो चुके थे, इसलिए एक आख़री प्रयास करने के लिए वे अपने ज्ञान और लंदन में मिले अनुभव को लेकर भारत वापस आ गए, और भारत में ही एक नई कम्पनी बनाने के प्रयास में लग गए। इस बार वह अपनी नई कम्पनी की स्थापना मजबूत तरीके से करना चाहते थे। यही कारण था कि वह किसी ऐसे फाइनेन्सर या पार्टनर की तलाश में थे जो आर्थिक दृष्टि से मजबूत हो।


सन् १९३३ में हिमान्शु राय सपत्निक बम्बई आ गये और देविका रानी के साथ उनकी चर्चित फिल्म 'कर्मा' का प्रदर्शन सन् १९३४ में हुआ। हिमान्शु राय चाहते थे कि भारत में फिल्म निर्माण को लेकर जो कमियाँ थीं उन्हें दूर किया जाए और ऐसे स्टूडियो का निर्माण हो, जहां फिल्मों का निर्माण उच्च स्तर का हो। इस सिलसिले में उन्होंने सर फिरोज़ सेठना, दिनशॉ पटेल जैसे कई बड़े नामी लोगों के साथ मुलाकात की, पर बात नहीं बनी। क्योंकि वो लोग सहयोग तो करना चाहते थे पर धन देने के मामले में उनके अन्दर हिचक थी। इसी दौरान हिमान्शु राय की मुलाकात उनके एक पूर्व परिचित अनिरुद्ध सिंह से हुई। वह कलकत्ता से ही उनके पूर्व परिचितों में थे। मुलाकात के दौरान हिमान्शु राय ने उन्हें अपनी योजना समझायी तो अनिरुद्ध सिंह ने कहा कि इतना पैसा लगा पाना उनके बस की बात नहीं है, फिर भी वह अपने मित्रों से इस विषय पर चर्चा अवश्य करेंगे। उन्होंने हिमान्शु राय को आश्वासन भी दिया कि वह आ इस काम को अन्जाम देने की पूरी कोशिश करेंगे।


उस समय १८९९ में कलकत्ता में स्थापित और बस काम कर रही मशहूर 'दूबे कम्पनी के मालिक सेठ बद्रीप्रसाद चर्चित व्यवसायियों में शामिल हो चुका था। जब अनिरुद्ध सिंह ने से हिमान्शु राय के साथ सिनेमा में पैसा लगाने की बात की, तो बद्रीप्रसाद ने साफ मना कर दिया और दो टूक जवाब दे दिया कि वह भविष्य में नाचने गाने वालों को पैसा देने की बात नहीं सुनना चाहते थे। पर अनिरुद्ध सिंह ने हिम्मत नहीं हारी। इस दौरान 'दूबे इंडस्ट्रीज़' के नाम से राजनारायण दूबे फाइनेन्स, ट्रेडिंग, भवन निर्माण आदि क्षेत्रों में सफलता के साथ काम कर रहे थे। वह इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि यदि राजनारायण दूबे राजी हो जाते हैं तो पैसों की कोई कमी नहीं होगी। एक दिन मौका मिला तो अनिरुद्ध सिंह ने ज्यादा जानकारी न देते हुए राजनारायण दूबे से विलायत से आए हिमान्शु राय से मुलाकात के बारे में कहा तो राजनारायण दूबे मुलाकात के लिए तैयार हो गए। अनिरुद्ध सिंह ने कोलाबा के होटल ताज में हिमान्शु राय और देविका रानी की मुलाकात राजनारायण दूबे से करवाई। हिमान्शु राय ने अपनी योजना और तैयारी के बारे में राजनारायण दूबे को विस्तार से बताया। पूरी बात सुनते ही अपने पिता की तरह ही राजनारायण दूबे ने भी सिनेमा में पैसा लगाने की बात पर साफ मना कर दिया। उनकी नज़र में इसका प्रमुख कारण उन दिनों फिल्म व्यवसाय को अच्छी निगाहों से नहीं देखा जाता था। इसके अलावा सिनेमा के नाम पर जो काम हो भी रहे थे, उन्हें कोई विशेष सफलता भी नहीं मिल पा रही थी।

राजनारायण दूबे के इनकार करने के बाद हिमान्शु राय निराश हो गए थे पर किसी फाइनेन्सर की तलाश का काम जारी रखा। धीरे-धीरे समय बीतता रहा, पर उन्हें कोई फाइनेन्सर नहीं मिला। उम्मीद से अपना सपना पुरा करने बम्बई आए थे वो उम्मीद अब ध्वस्त हो चुकी थी। उन्हें अपना सपना बिखरता नजर आ रहा था। उनका कला के प्रति समर्पित हृदय व्याकुलता की सीमा को पार कर रहा था और वो बेहद मानसिक दबाव में आ गए थे। जिसकी वजह से निराशा के अंधकार में निराश, हताश, भावुक कलाकार हृदय हिमान्शु राय ने आत्महत्या तक का प्रयास किया और असफलता के दौर मे यहाँ भी वे असफल ही रहे।


क्या किसी कलाकार के लिए कला, कला का स्वप्न और स्वप्न का साकार होना ही महत्वपूर्ण है? क्या कलाकार की कला–साधना में जीवन महत्वहीन है? राजनारायण दूबे जैसे सफल और कर्मठ व्यवसायी के अवचेतन में छुपी कला की सुप्त धारा निकलकर बाहर आ गई। राजनारायण दूबे अब जीवन को एक समृद्ध व्यवसायी की दृष्टि से नहीं, अपितु एक हताश-निराश स्वप्नदृष्टा, सम्भावनाशील कलाकार की दृष्टि से देखने लगे। हिमांशु राय की कला के प्रति समर्पण उन्हें अपने प्राण से भी विरक्त करने को उद्यत है तो उस कला की चेतना तो प्राण-ऊर्जा से भी गरिमामयी होगी। राजनारायण दूबे के अंतर्मन में जीवन सत्य के मेघ उमड़ते-घुमड़ते रहे और हिमान्शु राय का नवजीवन सार्थक हो गया।

हिमान्शु राय की आत्महत्या के प्रयास की ख़बर राजनारायण दूबे को भी मिली तो उन्हें आश्चर्य हुआ कि कैसे कोई आदमी अपने सपने के साकार न होने पर आत्महत्या की कोशिश कर सकता है? राजनारायण दूबे तुरन्त हिमान्शु राय के पास अस्पताल पहुंच कर बिना किसी शर्त के फिल्म निर्माण में उतरने की घोषणा कर दी। महत्त्वाकांक्षी फिल्म 'रसिक' हिमान्शु राय के समय ने करवट ली। राजनारायण दूबे, हिमान्शु राय एवं देविका रानी की त्रिमूर्ती ने बॉम्बे टॉकीज़ की नींव डाल दी और इस नयी कम्पनी का नाम पड़ा, "द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़


'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' के मूल नाम को लेकर बहुत विचार विमर्श हुए, बहुत चर्चाएं हुई। नामकरण को लेकर मतभेद का कारण यह था कि हिमान्शु राय अपने जीवन में अधिकतर समय विदेश में ही रहे, इसलिए वो इस सिनेमा कम्पनी का नाम अंग्रेज़ी में रखना चाहते थे। संस्कार से राजनारायण दूबे सनातनी ब्राम्हण थे इसलिए वह कोई भारतीय नाम रखना चाहते थे। कम्पनी के सही नाम का चुनाव नहीं हो पा रहा था। कम्पनी के सम्भावित नाम के इस विषय को लेकर सभी लोग परेशान थे। राजनारायण दूबे को परेशान देखकर मुम्बादेवी की अनन्य भक्त उनकी माता गायत्री देवी ने परेशानी का कारण पूछा तो राजनारायण दूबे ने उन्हें सिनेमा नाम को लेकर अपनी परेशानी बताई। माँ ने उन्हें कहा कि "चिन्ता मत करो" 'माँ मुम्बादेवी' सब ठीक कर देगीं। बस यहीं से मुम्बादेवी के नाम बॉम्बे टॉकीज़ सिनेमा कम्पनी की नींव पड़ी और इस वजह से अंग्रेजी भी सनातनी नामकरण की समस्या हमेशा के लिए समाप्त हो गई।


सभी लोगों को राजनारायण दूबे का सुझाया हुआ नाम 'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' अच्छा लगा और सभी ने इस कम्पनी का नाम रखने पर अपनी सहमति दे दी। इस तरह सिनेमा इतिहास की पहली अत्याधुनिक फिल्म कम्पनी 'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' एवं 'बॉम्बे टॉकीज घराना' की बुनियाद पड़ी।

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